अरे इंसा न ले नारी ओर प्रकृति का इम्तिहा
जब तक सह सकती हैं तब तक सहती हैं ये,
जब अपनी पे आती हैं ये
तो कभी महाकाली का प्राकोप,
तो कभी महामारी और सुनामी बन जाती हैं ये,
जो मानवता और धरा के इतिहास की जननी हैं
वो जो वात्सल्य और प्रेम की परिकाष्ठा हैं
वो किसी सामाजिक मापदंड या पहचान की मोहताज नहीं
वो नारी है बेबस और लाचार नही
वो जो मानव जीवन का आधार हैं
वो प्रकृति और नारी हैं कोई और नहीं .......
✍️प्रभा (कनिका)


🙏 शुक्रिया❤
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