आप सभी का हृदयतल से धन्यवाद मेरे साथ मेरे इस सफ़र में जुड़े रहने के लिए। तो चलिए बड़ते है रेखा के अंतरमन के सफ़र में आगे.......
रेखा ने आगे बताना शुरू किया....
सूरज ऑटो बुलाकर ले आया। मैं लगातार रो रही थी और अपनी सुध-बुध खो चुकी थी।रास्ते भर सूरज बस चुपचाप मेरा हाथ पकड़कर बैठा रहा। वो कुछ नही बोला और बस मुझे सम्भालता रहा। हम घर पहुँचे और मैं पलंग पर लेट गई। कुछ ही देर में मुझे पेट में दर्द हुआ। वो असहनीय दर्द था। मैं टॉयलेट में गई तो देखा मेरी ब्लीडिंग शुरू हो गई थी।
खून से सने मास के टुकड़े निकल रहे थे। वो मेरा बच्चा था, वो मेरे बच्चे की लाश थी। जो कट-कट कर टुकड़े-टुकड़े हो कर बह रही थी। मैं उसमें अपने बच्चे की आकृति बना रही थी। मानो जैसे किसी नदी में नरसंहार के बाद लाशें काट-काट कर फेंक दी हो और वो बह रही हो। ये तो बस शुरुआत थी। ये सिलसिला लगभग एक महीने तक चला और वो टुकड़े-टुकड़े होकर हर दिन मुझसे मेरे शरीर से दूर होता जा रहा था। हर रात वो सपने में आता अर्धनारीश्वर के रूप में और मुझसे पूछता की हमारा क्या दोष था।शायद अर्धनारीश्वर इसलिए कि कौन जाने जो इस दुनिया से गया वो लड़का था या लड़की।
अर्धनारिश्वर के रूप में आना इस बात का प्रतीक था कि या तो वो शिव था या शक्ति। मैं जानती हूँ कि शिव और शक्ति का विनाश मुमकिन नही पर जब वो इस धरा पर आए तो उनके अवतरित होने से पहले ही उनका विनाश कर दिया गया। और ये विनाश मेरे ही हाथों हुआ। और जो इस जन्म तो क्या मरने के बाद भी मेरे साथ रहेगा। कोई तपस्या, कोई पूजा, कोई यज्ञ, कोई जादू, कोई टोना-टोटका कुछ भी काम नही आएगा।
मैं कोई ब्रह्मा नही हूँ जो अपने बुरे कर्मो से निजात पा लू और पवित्र हो अपना कार्य करती रहूँ ।
(कहते है पौराणिक कथाओं के अनुसार ब्रह्मा जी ने कई गलतियां करी और पश्चाताप स्वरूप योगा अभ्यास द्वारा अपने शरीर को भस्म कर दुबारा से अवतरित हो अपने कार्य में लग गए । )
"माना वो ब्रह्मा सृष्टि का रचनाकार है,
उसे गलतियों का भी अधिकार है,
पर मैं न तो सृष्टि कि रचनाकर हूँ,
और न मुझे गलतियों का अधिकार है,
न मैं माया हूँ न मैं योग माया हूँ
मैं तो युगो- युगांतरों से,
काल- कालांतरों से बस एक शापित साया हूँ ..."
पर पता है मैं इस गुनाह की चादर लपेटे अब तक जी रही हूँ। कई रातों तक मुझे दूर कहीं से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आती रही। पर इस मायावी दुनियाँ में मैं इस गुनाह की चादर को लपेटे हुए धीरे-धीरे इस दुनिया के रंगो में रंग तो गई पर........
और वो ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। पर इस बार मैं भी खुद को नही रोक पाई। मेरे भी आँखों में आंसू थे। मैंने उसे गले से लगा लिया कस कर। हम दोनो बहुत देर तक रोते रहे ।
पर जैसे अब भी कुछ था। जो वो कहना चाहती थी। वो जो दिल से एक बार बताना चाहती थी। उसने खुद को सम्भालते हुए कहना शुरू किया।
रेखा ने कहा - "प्रभा सच में ये वक्त भी क्या चीज़ है जीवन के कैसे-कैसे दौर दिखाता है। हमारी सोच और कल्पनाओं के विपरीत एक वो दौर था और मेरे साथ तो शायद आज भी है और जीवन के अंतिम शण तक मेरे साथ चलता रहेगा।
पर एक दौर वो भी आया जब अगले ही साल सूरज की नौकरी पक्की हो गई और कुछ ही सालो में वो ब्रांच मैनेजर की पोस्ट पर नियुक्त हुआ और फिर हमने दूसरे बच्चे के बारे में सोचा और 6 साल के अंतराल के बाद हमारी गोद में गीता आई जो अब 7 साल की होने वाली है। उसका नाम मैंने ही गीता रखा था इस उम्मीद में कि जब भी उसे पुकारूँ शायद मेरे उद्धार की कोई उम्मीद जागे।
पर सच कहूं प्रभा मेरे दिल में एक घाव है, गहरा घाव, एक ऐसा घाव जो कभी नही भरेगा। वो जो मेरे औरत होने पर मुझे शर्म का अनुभव कराता है ।एक ऐसी पीड़ा जो कभी शांत नही हो सकती।और शायद इसकी कोई दवाई भी नही है।
सचमुच तुम ही बताओ प्रभा क्या मेरी मुक्ति सम्भव है या नही बताओ न बताओ न.................
उसके इन प्रश्नों के मायने जो मैं पहले नही समझ पाई थी वो अब मेरे सामने स्पष्ट हो रहे थे।
मैं हैरान थी कि ये वही कॉलेज वाली रेखा है।मैं सन थी। सच ज़िंदगी कब किसको किस मोड़ पे ले जाएगी पता ही नही चलता।
नोट - आगे की कहानी जानने के लिए आप सब से गुज़ारिश है कि आप सब बस जुड़े रहे मेरे साथ मेरे अनुभवो के सफ़र में। आप सभी का हृदयतल से आभार।
