गोविंद प्रेम
न आको मेरे प्रेम को, मेरे पहनावे से
मेरे पहनावे का रंग रूप, मेरे प्रेम का पैमाना नही
मेरे प्रेम का पैमाना,मेरे मन मे बैठा गोविन्द हैं
और गोविन्द के मन मे बेठी मैं,और उसके भक्त हैं
लेखक
बेशक़ लेखक स्वतंत्रत होता हैं
अकल्पनीय सोच का मालिक होता हैं
कभी कभी उसके भी लेख
डगमगा जाते हैं
कुछ संवेदनशील विषय
उसके ह्रदय को भी तार-तार कर जाते हैं
ज़ुर्रत
हाँ कुछ लम्बे हैं मेरे अफ़साने
पर यकीन हैं मुझे एक दिन
गुनगुनाएगा सारा जहां इन अफ़सानो को
हर दिल मे मेरा नाम होगा
हर लब पे मेरा अफ़साना होगा
हाँ ये ज़ूरत मैंने की हैं
यक़ीनन ये ज़ुर्रत मैंने की हैं
इस बार औकात से बड़े ख्वाब
देखने की ज़ुर्रत मैंने की हैं
खुदा की ख़ुदाई पर कर यकीन
ज़माने की न सुनने की ज़ुर्रत मैंने की हैं
🙏🙏🙏🙏🙏🙏
आपकी अपनी लेखिका
प्रभा (कनिका)
लिखती हूँ कुछ दिल से ............

Lovely
ReplyDelete🙏शुक्रिया 🙏
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