चलिए अब मेरे तीसरे प्रयोग की तरफ़ चलते है।
3. कीचड़ में कमल - "कीचड़ में कमल" वेसे तो यह एक प्राकृतिक परिस्थिति है, पर इसका उदाहरण अक्सर प्रेरक संदर्भ में दिया जाता है। जिसमें कहा जाता है की चाहे आप के आसपास कितनी भी बुराई ही क्यूँ न हो फिर भी आप कमल की तरह पाक साफ़ रह सकते है।
में इसे पूरी तरह से तो नही नकार सकती। यकीनन ये हो सकता है , परंतु इसका प्रतिशत बहुत कम है।
पर वाक़ई क्या कमल होना आसान है?
इस बात का पता लगाने के लिए मेने गपशप(gossip) मंडली के कुछ लोगों से दोस्ती करी। ये बहुत ही अलग अनुभव था।अब इसे मनोरंजक कहूँ या भयावर कुछ समझ नही आ रहा था।
दबी कुचली मानसिकता अपने आप को सबसे बेहतर बताने की होड़। परमात्मा द्वारा दी हुई धन सम्पत्ति का घमंड।हर शक्स अपनेपन की आड़ में छुरा घोपता हुआ मिला।
इस कीचड़ की बाड़ में कमल होना नामुमकिन तो नहीं पर मुश्किल ज़रूर लगता है। मेने ये अनुभव किया की आपको इस कीचड़ का हिस्सा बनना पड़ेगा नही तो आपको बहिष्कृत कर दिया जाएगा।
नीचता का स्तर -
एक बात और जो मेने इस प्रयोग के अंतरगत अलग अलग लोगों से बात करते वक्त मेने महसूस की। कि जब भी कोई इंसान किसी की बुराई करता है तो हमें सिर्फ़ उसे देखना और सुनना है और ऐसा करते वक्त आप अनुभव करेंगे की वह इंसान हर शब्द और वाक्य के साथ हर पल कितना गिरता जा रहा है जिसका उसको एहसास भी नही होता । या यू कहे की शायद होगा भी तो अब उसका कमल होना असम्भव है ।
शायद वो यह सोचता है कि कही वो समाज से अलग न हो जाए। पर वो यह नही सोचता की जिस समाज के पीछे वो पागल है, वो एक बदबूदार कीचड़ है।
जहाँ तक में समझ पाई मुझे लगता है इस कीचड़ में कमल होना नामुमकिन है।
यहाँ में आप सभी से और अपने आप से भी कुछ प्रश्न पूछना चाहती हूँ कि -
क्या इस तरह का व्यवहार हमें आगे ले जा पाएगा ?
क्या इस मानसिकता के साथ हम एक बेहतर समाज की नीव रख पायेंगे?
क्या हम अपनी आने वाली पिड़ी को भी इस दलदल का हिस्सा बनाना चाहते है?
अब ये हमें तय करना है की हम इस कीचड़ का हिस्सा बने या फिर इसे साफ़ करे ?
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