अब प्रश्न यह उठता है की बातचीत का स्तर कैसा हो?
- यहाँ में एक बात कहना चाहूँगी बातचीत या वार्तालाप बहुत ज़रूरी है हमारे लिए। क्योंकि की वो ज़रिया है हमारे मन की बात और विचार साँझा करने का।
- इस धरा की संस्कृति और इतिहास का आधार है बातचीत।जिसके द्वारा विभिन देश, विभिन्न संस्कृति, भाषा, धर्म, जाति के लोग एक सूत्र में बंधकर ज्ञान का आदान-प्रदान करते है।
" किसी भी प्रकार की बातचीत जिसका हमारे या समाज के विकास में योगदान हो वह बेहतरीन है।"
बातचीत के द्वारा कभी कोई हानि नहीं होती, शर्त सिर्फ़ इतनी होती है की दो लोगों द्वारा की गई बातचीत दो लोगों के बीच में रहे और उसे गलत तरीक़े से दूसरों के सामने पेश न किया जाए।यानि उसका मूलस्वरूप न बदला जाए।
पर जब भी बातचीत का मक़सद किसी की मानसिकता, सामाजिकता या संवेदनाओं का हनन होगा, तब जो हानि होगी, वह क्रूरता की चरम सीमा होगी।
हमारे समाज की कई मुश्किलें जैसे अवसाद (depression), आत्महत्या (suiside) आदि , समाजिक चादर ओड़े ज़हरीली बातचीत का ही परिणाम है।
सचमुच बातचीत और गॉसिप की जो डोर होती है वो बहुत नाज़ुक होती है।हमारी बातचीत का स्तर कब इस हद तक गिर जाता है की किसी की प्रतिष्ठा को तार-तार कर देता है हमें पता ही नही चलता।
चलिए अब मेरे दूसरे प्रयोग की तरफ़ बड़ते है
2. प्रतिक्रिया न देना
- सच कहूँ तो ये मेरे लिए यह एक चुनौती की तरह था क्यूँकि अमूमन मेरी प्रतिक्रिया बहुत जल्द प्रकट हो जाती है। इस मामले में मेरा मुझ पर बस नहीं चलता। पर सीखने के लिए तो सबकुछ करना पड़ता है।
फिर उस ज़हर को आगे बाटा जाता है और ये सिलसिला यही यू ही आगे बड़ता चला जाता है।
सचमुच यह एक दलदल है।एक बार अगर आप इसमें फस गए तो बहुत ही मुश्किल है इसमें से निकल पाना ।पर यदि कोई वक्ति इन सबसे निकलना चाहता है या कोशिश करता है तो लोग उसे बहिष्कृत करना शुरू कर देते है।
लोगो की सोच आपके प्रति नकारतमकता से भर जाती है। वो आपको घमंडी , असामाजिक जाने क्या क्या कहना शुरू कर देते है।
यहाँ में कहना चाहूँगी की 'कभी-कभी अकेले रहना बहतेर होता है, नकारात्मक लोगों से' ।
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नोट - मेरे अगले प्रयोग के लिए जुड़े रहे मेरे साथ मेरे इस सफ़र में।
🙏🙏🙏🙏🙏🙏
आपकी अपनी लेखिका





