नग़मे इस दिल के
दबें हैं कुछ इस नग़मे दिल में
निकलने को बेकरार हैं
ज़माने भर की उलझने हैं इस दिल में
उन सब से टकराने को तैयार हैं
उसे कोई नहीं समझता
ऐ ख़ुदा
उसे कोई नहीं समझता
क्योंकि
वो तुझे दुआओं में नहीं
बदुआओं में याद करता हैं
ज़माने भर की ढोकरें खाई हैं
वो बदुआओं में
तेरा शुकराना अदा करता हैं
🙏🙏🙏🙏🙏🙏
आपकी अपनी लेखिका
प्रभा (कनिका)
लिखती हूँ कुछ दिल से ............

Nice
ReplyDelete🙏 शुक्रिया 🙏
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