जीवन की मध्य बेला
अजब सी हैं
जीवन की यह मध्य बेला.......
बेचैनीयों का समंदर लेके आई हैं
जीवन की यह मध्य बेला..........
बचपने को छिपाने और बड़प्पन को दिखाने की हैं
जीवन की यह मध्य बेला.........
दिखावे और ढकोसलो से भरी हैं
जीवन की यह मध्य बेला..........
खुद से संघर्ष करने की हैं
जीवन की यह मध्य बेला.......
अपनों को खो देने का डर लेके आई हैं
जीवन की यह मध्य बेला.......
सपनों से जगाकर यथार्थ से साक्षात्कार कराने आई हैं
जीवन की यह मध्य बेला.........
एक गुज़ारिश
-ख़ुदा के लिए न आंकना मेरी शख्सियत
को मेरे जनाज़े में खड़ी भीड़ से
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कौन कहता हैं की मेरे जनाज़े में खड़े सभी
मेरे अपने थे
क्या वाकई वो मेरे अपने
मेरे अपने थे
कौन जाने अपनों की खाल में
कितने अपने ओर कितने पराए थे
ये तो हम जानते थे
या हमारा ख़ुदा जानता था
🙏🙏🙏🙏🙏🙏
आपकी अपनी लेखिका
प्रभा (कनिका)
लिखती हूँ कुछ दिल से ............

👍
ReplyDelete🙏 शुक्रिया 🙏
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