Monday, March 22, 2021

परमात्मा की सीख - सभ्य समाज की ओर (Part -1)

 


                                                       वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ।                                                      निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ।।

प्रथम पूज्य है श्री गणेश। देवों के देव कहलाते है श्री गणेश।विघ्नहर्ता सूखकर्ता कहलाते है श्री गणेश। में जब भी उनके बारे में चिंतन और मनन करती हूँ हर दिन मेरी सोच और विचारधारा में कुछ न कुछ update होता  जाता है। 
मुझे लगता है की 'जो चिंतन और मनन हम में सकारात्मक बदलाव लाए वह सर्व्श्रेष्ट है'। 
पिछले कई वर्षों से गणेश उत्सव पर श्री गणेश हमें अपने ही दिए हुए घर में पधार कर हम पर कृपा कर रहे है। वह जब भी आते है कुछ न कुछ सिखा के ही जाते है।एक दिन अचानक पूजा के दौरान जब में उनकी आरती गुनगुना रही थी तो अचानक मेरा ध्यान कुछ शब्दों पर केंद्रित हुआ और में एक गहन चिंतन में खो गई ।वो शब्द थे -
"अंधन को आँख देत कोड़िन को काया      
बाँझन को पुत्र दें निर्धन को माया "
अंधन को आँख देत से क्या अभिप्राय हो सकता है?
क्या वकई कोई अंधा अचानक से देखने लग जाएगा। में इस बात को पूरी तरह से नकार तो नहीं रही ये हो सकता है। पर जाने क्यू  मेरा ध्यान सिक्के के दूसरे पहलू पर गया।मेरा मानना है की यहाँ बात बिना आँख वाले अंधो की हो ही नहीं रही। यहाँ तो नेत्र वाले अंधो की बात हो रही है। जो आँखे होते हुए भी समाज में घटित कुरितियों अत्याचारों को देख कर भी आँखे मुंदे रहते है। जो सही को सही और गलत को गलत कहने की शक्ति तक नहीं रखते।
"बाल गंगाधर तिलक जी ", जिन्होंने गणेश उत्सव की नीव रखी थी उनका मक़सद था समाज में एकता और प्रेम लाना।
वही आज कुछ लोग इस उत्सव के मूल मक़सद को भुला के इस उत्सव को जात-पात, आमिर-गरीब आदि मापदंडो में तोल रहे है।
उनका अंधापन उनके व्यवहार में झलकता है। ऐसे अंधे समाज के लिए ख़तरा है।अपने पैसे और अभिमान में चूर अंधे  किसी को कुछ नहीं समझते।किसी का भी शोषण करने से नहीं डरते। यहाँ  बात उन अंधो की हो रही है।
जैसे कुबेर जी के आमंत्रण पर गणेश जी ने उनके घर भोजन पर जाकर उनका अभिमान और आँखे खोली थी । उसी प्रकार यहाँ समाज के इन अंधो की आँखे खोलने की बात हो रही है।
अब बात करते है 'कोड़िन' को काया की' 
अब कोड़िन को काया से क्या अभिप्राय है?
क्या ये मुमकिन है की कोई कोड़ी अचानक के कोड़ मुक्त हो गया हो?  में स्पष्ट रूप से तो इस बारे में कुछ नहीं कह सकती। पर मुझे लगता है की यहाँ बात इंसान के दिल और दिमाग में बसे कोढ़ की हो रही है।दिल और दिमाग में बसा कोढ़ बीमारी की तरह है। लोगों में समवेदनशीलता की कमी, भेड़चाल में जीने की आदते आदि कई चीजें है जो आसानी से ख़त्म नहीं हो सकती है।
हाँ, यदि अंधो को आँखे मिल जाए और उन्हें सब कुछ स्पष्ट-स्पष्ट दिखाई देने लग जाए।तो उनके दिल और दिमाग के कोड़ के मिटने की सम्भावना है।
इसीलिए तो कहा गया है की "अंधन को आँख देत कोड़िन को काया "
------------------------------------------------------------------------------------------------------------------ नोट - बाँझन को पुत्र दें निर्धन को माया के बारे में मेरी नज़र से जानने के लिए जुड़े रहे मेरे साथ मेरे इस सफ़र में।
🙏🙏🙏🙏🙏🙏 आपकी अपनी लेखिका  प्रभा (कनिका) लिखती हूँ कुछ दिल से ............


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