''पर वो ख़्वाब और वो सपने शायद मेरे नसीब में ही नही थे"।
उसकी ये बात जानें क्यों पर मुझे अंदर तक हिला गई ना जाने कितने सवाल मेरे मन में घूम गाए। मैं जानना चाहती थी कि आख़िर उसके साथ क्या हुआ। क्यों वो खुद को और अपने नसीब को दोष दे रही थी।क्यों वो खुद को कसूरवार समझ रही है।
रेखा ने आगे बताना शुरू किया -
जैसे ही शाम को सूरज घर आए मैंने उनको अपने गर्भवती होने की खबर दी। मैं ख़ुशी और सुकून का अनुभव कर रही थी और आसमान की ऊँचाइयों में गुम ख़्वाबों की दुनिया में उड़ान भर रही थी। पर सच तो ये है कि वो ख़्वाब था और ख़्वाब कहां सच होते है।
मैं उत्सुकता से उसकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार कर रही थी। मैंने अपने ख़्वाबों में उसके ख़ुशी से मुझे चूमते और गले लगाते देखा था।परंतु यथार्थ की प्रष्ठभूमि अलग होती है।
वो चुप था वो कुछ नही बोला। उसकी चुप्पी का कारण मैं समझ नही पाई। कुछ देर चुप रहने के बाद जब वो बोला तो मेरी दुनिया ही जैसे उलट गई।
उसने कहा कि वो इस बच्चे के लिए अभी तैयार नही है। मैं इस बच्चे को गिरा दूँ । उसने कहा कि अभी उसकी आर्थिक हालत ठीक नही है और वो बच्चे की ज़िम्मेदारी उठाने के लिए अभी तैयार नही है।
मैं इस बात के लिए तैयार नही थी। मैंने इस बात का विरोध करना चाहा पर उसने मुझे अपनी माली हालत की दुहाई दी। आर्थिक संकट की सच्चाई से तो मैं भी मुँह नही मोड़ सकती थी। फिर भी मैंने उसे समझाने की कोशिश करी और कहा "कि आने वाला अपनी किस्मत साथ लेकर आता है, जो जन्म देता है वो पालता भी है और रक्षा भी करता है।"
परंतु उसके तर्कों के आगे मैं हार गई क्योंकि मेरे तर्क माँ के दिल से निकले थे और उसके यथार्थ की संभावनाओं से।
खैर हम डॉक्टर के पास पहुँचे। वो एक जानी-मानी गायनोकोलॉजिस्ट थी। इन्होंने (सूरज ने) उनके सामने गर्भपात की इच्छा जताई।डॉक्टर ने उसी समय अल्ट्रासाउंड किया और गर्भपात की दवाइयाँ लिख दी।
मैं ये देख कर हैरान थी कि इंसानी संवेदनशीलता कैसे इतनी मार जाती है।
जब मेरे आँसू डॉक्टर के आगे छलक आए तो उन्होंने जो कहाँ वो मैं आज तक नही भूल पाई। उन्होंने कहा -"यहाँ पर रोने-धोने की ज़रूरत नही है ये सब आपकी मर्ज़ी से हो रहा है, रो कर हमें गुनहगार साबित करने की ज़रूरत नही है। बाहर जा कर रोय और यह तय कर लीजिए की आपको क्या करना है। हमें और भी मरीजों को देखना है।"
"मैं आश्चर्यचकित थी ये सब सुनकर। ये सब बताते वक्त रेखा असहनीय दर्द में थी।ये वो ज़ख़्म था उसके जीवन का जो कभी भरा ही नही था ।"
इस संवेदनशील समय में डॉक्टर की असंवेदनशीलता समाज को कटघरे में खड़ा करती है।हमारी आत्मीयता की मृत्यु की तरफ़ इशारा करती है।
रेखा का दर्द जैसे अब मेरा दर्द बन गया था। मैं असहनीय दर्द का अनुभव कर रही थी।मैं भी रोना चाहती थी। पर मैने खुद को सम्भाला क्योंकि मैं जानना चाहती थी कि आगे उसके साथ क्या हुआ।
उसने बताया किया कि डॉक्टर के केबिन से निकल कर सूरज उसे बाहर बिठा कर दवाइयाँ लेने चला गया। और वो अपने पेट पर हाथ रख बस रो रही थी।वो बोली " मैं उसे खोना नही चाहती थी, सचमुच मैं उसे नही खोना चाहती थी, कभी नही।उस वक्त एक पल को ऐसा लगा जैसे कि मैं कोई जल्लाद हूँ और वो जो मेरे गर्भ में है, एक क़ैदी है जो कुछ ही समय का मेहमान है और हम इतने निरदई जल्लाद है जिन्होंने उसकी आख़री ख्वाहिश तक उससे नही पूछी। ये आख़िरी स्पर्श था, आख़िरी मिलन था मेरा और उस नन्ही सी जान का। ये एक असहनीय दर्द था मेरे लिए।एक बार तो मेरा मन किया कि मैं वहाँ से भाग जाऊँ।पर सच तो ये था और शायद आज भी यही है कि मैं कायर हूँ। वरना तब मैं उस पाप से बच सकती थी मेरे पास वो समय था।
मैं इस उधेड़बुन में थी कि तभी सूरज वहाँ दवाइयाँ और पानी का ग्लास ले आया।मैंने उसकी तरफ़ देखा भी नही क्योंकि मेरा पूरा ध्यान मेरे गर्भ में साँस ले रहे मेरे बच्चे की तरफ था।
अचानक उसने (सूरज ने) मुझे ज़ोर से झँझोरा और कहा - "रेखा ज़्यादा मत सोचो, जितना सोचोगी उतनी तकलीफ़ होगी "। जाने वो ये खुद को समझा रहा था कि मुझे। उसकी बात अभी पूरी नहीं हुई थी। उसने कहा -"भगवान के लिए मुझे समझने की कोशिश करो और ये दवाइयाँ खा लो।"
मैं सुन पड़ चुकी थी, मानो मेरे शरीर, मन दिमाग को लकवा पड़ गया था। बस एक मेरा दिल ही धड़क रहा था जो चिल्ला रहा था कि मेरी सुनो ,मेरी सुनो जो कि मैं सुनना भी चाहती थी। पर परिस्थितियों वश मैंने उसकी सुनी नही और मैंने वो दवाइयाँ खा ली।और जैसे ही मैंने वो दवाइयाँ खाई मैं ज़ोर से चिल्लाई ।मैं भूल गई कि मैं कहां खड़ी हूँ।मर्यादा इस शब्द से मुझे नफ़रत हो गई।लोक-लाज और इंसानियत जैसे खंडित हो गई। मेरे अंदर की औरत मर गई। मेरा बच्चा मुझसे सदा के लिए दूर हो गया पर बात यहाँ कहाँ ख़त्म हुई ...........
नोट - आगे की कहानी जानने के लिए आप सब से गुज़ारिश है कि आप सब बस जुड़े रहे मेरे अनुभवो के सफ़र में।

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