Sunday, November 28, 2021

भ्रूण हत्या (Part -2) - रेखा और उसका अंतर्मन

रेखा और उसका अंतर्मन 


तो चलिए बड़ते है मेरी पहली कहानी की तरफ -

वो बिलकुल बदल गई थी। आज एक नई  रेखा नज़र आ रही थी। उसका शांत स्वभाव मुझे हैरत में डाल रहा था। उसका मौन मुझे काट रहा था। उसकी संजीदगी जाने क्यों मुझे खाए जा रही थी। उसकी हंसी भी अब खोखली सी लग रही थी। मैं उसे सालों से जानती थी ये वो रेखा नहीं थी जिसे मैं जानती थी।

वैसे देखने से तो सब कुछ सहज ही लग रहा था।पर कुछ तो था जो मैं समझ नही पा रही थी।

उसका पति सूरज एक सरकारी बैंक में नौकरी करता था।मुंबई जैसे शहर में अपना घर था। पड़ी लिखी होने पर भी उसने (रेखा ने ) अपनी ग्रहस्थी को और अपने दो बच्चों (रयान)(13) और गीता(7) की ज़िम्मेदारी को महत्व देते हुए घर पर ही रहकर उन्हें सम्भालने का फ़ैसला लिया। और सूरज ने भी हमेशा उसके हर फ़ैसले का सम्मान किया और हमेशा उसका साथ दिया।

आप लोग सोच रहे होंगे कि मैं ये सब कैसे जानती हूँ।जी मेरा नाम प्रभा है। जी हाँ आपकी अपनी लेखिका जो लिखती है कुछ दिल से। जो रेखा और उसके अंतर्मन के सफ़र में रेखा की श्रोता और आपके लिए एक वक्ता और दृष्टा की तरह आपके साथ बनी रहूँगी ।


मैं (प्रभा) जो कि रेखा के कॉलेज की सहेली भी है। मुझे आज भी सब याद है जैसे कल की ही बात हो। हसती खिलखिलाती मस्त मोला लड़की थी रेखा। यदि में शारीरिक तौर पर बात करु तो वह जवानी की दहलीज़ पे कदम रख चुकी थी पर मानसिक तौर पर आज भी अपने बाल्य काल में थी।

वो कॉलेज की दूसरी लड़कियों की तरह बिल्कुल नही थी। और इस सब का श्रेय में देती हूँ उसके माता पिता को।

जहाँ  कॉलेज की अधिकतर लड़कियाँ अपने माता-पिता से झूठ बोलकर घूमने चली जाती थी, वही वो अपनी मम्मी से पूछकर घूमने जाती थी। में कई बार उससे कहती थी कि अगर तू हमारे साथ घूमने चली जाएगी तो किसी को भी पता नही चलेगा। इस पर वो जवाब देती कि हाँ मेरे माता पिता या किसी ओर को पता नहीं चलेगा लेकिन मुझे तो पता चलेगा ना। मैं अपने आप से कैसे बचूँगी या छिपूँगी।

सभी के साथ मस्ती मज़ाक, सभी प्रोफेसर से साथ उसकी बातचीत होती थी। कॉलेज के हर इवेंट में उसकी प्रतिभागिता रहती थी।चाहे वाद-विवाद प्रतियोगिता हो, नृत्य हो, नाटक या फिर दिल्ली पुलिस का आत्म-रक्षा प्रशिक्षण, या क्रिकेट का मेत्री मैच हो।

सचमुच मेरे लिए तो वह प्रेरणा स्त्रोत  थी।

इसीलिए आज जब में उससे लगभग 15 साल बाद मिली तो उसे देख कर में हैरत में पड़ गई।दरसल में शादी के बाद दिल्ली शिफ़्ट हो गई थी और वो बम्बई। कल उसकी छोटी बेटी गीता का जन्मदिन था।और हम उसकी  तैयारियों  में लगे हुए थे।

मैं अंदर से बहुत बेचेंन थी।मैं उससे पूछना चाहती थी कि आख़िर तुम्हें क्या हुआ है।तुम क्यों इतनी बदली-बदली नज़र आ रही हो। मैं ये सब सोच ही रही थी कि अचानक उसने मोका पाकर जब सब चले गए तो जिस कमरे में हमें ठहराया था मुझे आकर गले से लगा लिया और ज़ोर ज़ोर से रोने लगी।और कहने लगी "की मेरी मुक्ति कब होगी, क्या वो होगी भी या नहीं"

मैं हैरान थी। लगा जैसे मेरे कुछ बुरा होने का अंदेशा सच हो गया हो।मैं  बहुत डर गई।

पर फिर खुद को सम्भालते हुए मैंने उसे आराम से बिठाया और पानी पिलाया। उसे शांत करके मैंने उससे कहा की क्या हुआ है मुझे आराम से बताओ।'क्या सूरज ने कुछ' मेरे इतना कहने पर ही उसने कहा नहीं- नहीं वो तो बहुत अच्छे है।उनसे अच्छा इंसान तो मेरी ज़िंदगी में कोई हो ही नही सकता। ये तो मेरे ही पिछले जन्म के पाप है जो मेरे आगे आ रहे है। उसके ये शब्द मेरी जिज्ञासा को और बड़ा रहे थे।

मेरे अंदर जैसे प्रश्नो की झड़ी सी लग गई जो मैं उससे पूछना चाहती थी। पर उसकी व्यथा देखते हुए मेरी हिम्मत ही नही हो रही थी।

मैंने बस उसे गले से लगा लिया। मानो जैसे वो इस आलिंगन को ही तरस रही थी।

फिर कुछ हिम्मत करके उसने बताना शुरू किया। बात उन दिनों की है जब रयान (8) महीने का था।सब कुछ सही चल रहा था। मैं बहुत खुश थी। पर तब सूरज की जॉब फ़िक्स नही थी। उनकी नौकरी अस्थायी थी । उनकी सेलरी भी काफ़ी कम थी।

और उन्हीं दिनों मुझे पता लगा कि मैं दुबारा माँ बनने वाली हूँ। मैं बहुत खुश थी।मेरी ख़ुशी का तो कोई ठिकाना ही नहीं रहा। मेरे लिए यह एहसास दुनिया की किसी भी चीज़ से बहुत बड़ा था। जैसे ही मुझे पता लगा मेंने जाने कितने ही ख़्वाब सजा लिए थे ।  

पर वो ख़्वाब और वो सपने शायद मेरे नसीब में ही नही थे। 

रेखा बोलती जा रही थी और मैं सुनती जा रही थी। पर इस वार्तालाप के दोरान मेने अनुभव किया जैसे कुछ समय के लिए ही सही मुझे मेरी पुरानी रेखा नज़र आने लगी थी। शायद एक लम्बे अंतराल के बाद वो अपना दिल किसी के सामने रख रही थी।

अचानक से कभी आँखों में चमक तो अचानक से कभी अश्रु धारा  बहने लगती थी। सचमुच कभी-कभी उसकी मनोवृति को समझना मेरे लिए बहुत कठिन साबित होता जा रहा था। परंतु फिर भी मैं शांत होकर उसके हाथों को अपने हाथों में लिए बस उसे सुनती जा रही थी।

जारी .............................................................................................................................................................


नोट - अपनी पहली कहानी को आप सब के साथ में साँझा करने के लिए जो देरी हुई उसके लिए मैं  तहें दिल से आप सब से माफ़ी माँगना चाहती हूँ। सच कहूँ तो रेखा और उसके अंतर्मन की यात्रा का कलम पर बेठ कर कागज़ की सड़क पर उतरना इतनी बड़ी चुनोती होगी मैंने  कभी सोचा भी नहीं था।

रेखा के अंतर्मन की कहानी तो बस अभी शुरू हुई है। आगे की कहानी जानने के लिए आप सब से गुज़ारिश है कि आप सब बस जुड़े रहे मेरे अनुभवो के सफ़र में।


🙏🙏🙏🙏🙏🙏
आपकी अपनी लेखिका 
प्रभा (कनिका) लिखती हूँ कुछ दिल से ............



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