निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ।।
अब बात करते है 'निर्धन को माया' की।
अब 'निर्धन को माया' से आपका क्या अभिप्राय है?
क्या वाक़ई में कोई निर्धन अचानक से धनवान हो सकता है?
ये हो सकता है।इस बात को पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता। परंतु मेरे मत अनुसार यहाँ बात पैसे की निर्धनता की हो ही नहीं रही। बल्कि यहाँ बात मन कि निर्धनता की हो रही है।
हमारे ही समाज के कुछ लोग धन और ऐश्वर्य युक्त होते हुए भी, अपने मन, आचरण, बुद्धि, कर्म आदि से निर्धन है।उनके पास सब कुछ है मन कि शांति, प्रेम ,दया आदि का अभाव है।
दूसरों को हीन भावना से देखना, किसी को कुछ न समझना आदि कुंठाओ से ग्रसित है।ये लोग दरअसल बुरे नहीं है, ये बीमार है और ये बीमारी इन्हें समाज से ही मिली है।
शायद इस बीमारी का इलाज कुछ हद तक सम्भव है।
जब अक़्ल के अंधो को आँखे मिल जाएगी और उनके दिल और दिमाग का कोड़ मिट जाएँगे और जब हर बाँझन माँ कहलाएगी तो एक बेहतर समाज बनेगा तब इन निर्धनो को माया मिल जाएगी।
सचमुच अगर हम अपना नज़रिया ज़रा सा बदल ले और परमात्मा द्वारा दी गई सीख को सही तरीक़े से समझे और अपने जीवन में उतार ले तो हम एक सभ्य समाज की नीव रख सकते है।
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नोट - मेने अब तक जो भी लिखा या कहाँ ये पूरी तरह से मेरे विचार है।हो सकता है की आप लोग इससे सहमत हो या न भी हो।
मेरे अभी तक के blogs के बारे में आपका क्या विचार है, पक्ष में या विपक्ष में कृपया करके comment box में comment करके बताए।
आपके विचार और आपकी सलाह मुझे बेहतर और कुछ नया सोचने के लिए प्रेरित करेगी।🙏🙏🙏🙏🙏🙏
आपकी अपनी लेखिका


Nice
ReplyDelete🙏 शुक्रिया 🙏
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